मंगलवार, 23 अगस्त 2011

पीलीबंगा की यादें






पाठक मंच "पीला पंजा"
द्वारा :- रूपसिंह राजपुरी

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011



हनुमानगढ़़ के कई स्कूल व गांव हॉकी में अव्वल

हनुमानगढ़़ के कई स्कूल व गांव हॉकी में अव्वल










सोमवार, 27 दिसंबर 2010

पुलिस


पुलिस अलबादी छोरो |
जके गे हाथ में डंडियों पाँच पोरो |
कानी- कानी जेबां, महं माल नावड़े बोरो |
जनता बोरडी गो पेड़,
ओ जद चढ़ ज्य बीं छोरे गे गेड़,
तो जित्ता डंडिया पड़े,
बित्ता ई बोरिया झड़े|

रविवार, 19 दिसंबर 2010

सीख


बरसना है तो रामजी ढंग स्यूं बरसो,
गाजण-गूजण में के पड़यो है |
पति न परमेशर मानो ए पत्नियों,
साजण-सूजण में के पड़यो है |
घरूं पढ़ण जान्ती छोरियां न इत्तो ई कहंनो है ,
थे दौड़ लगाण सीख ल्यो,
भाजण-भूजण में के पड़यो है

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

दिल की बात


जुबां जब चुप रहती है,
निगाह बात करती है |
तेरी झुकी हुई निगाह भी,
खुबसूरत फ़साना है |
वो उंगली पर लपेटना दुपट्टा,
पांव के अंगूठे से धरती पर
कुछ लिखना और मिटाना,
रुक-रुक के चलना ,
फिर पलट के देखना,
शरमा के भाग जाना ,
और छत पर आ जाना
तस्लीम-ए-मुहब्बत का
दिलकश बहाना है |

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

लो भाई दीवाली आई
















रोशनियों के रथ पर चढकर,
उमंगों के वसनों में सजकर,
मंगलमयी संदेशा लाई।
लो भाई दीवाली....।
पकी बाजरी मचले मोठ,
बना मतीरा गोरी के होंठ,
रूई के खेत में चांदी छाई।
लो भाई दीवाली....
कोट स्वेटर का हुआ स्वागत,
गुड़ गज्जक की हो गई आगत,
छुप गये शर्बत, बर्फ, ठण्डाई।
लो भाई दीवाली....
दे गई ठंड गुलाबी आहट।
सूरज से छिन गयी गर्माहट
अच्छी लगने लगी रजाई।
लो भाई दीवाली....
मच्छर मक्खी से पिण्ड छुड़ाये,
दिन रातों में पढने के आये,
रामलीला को मिली बिदाई।
लो भाई दीवाली.....।
घर, आंगन और सजी दुकान
ललचाने लगे हैं अब पकवान,
रंग-रोगन आई हुई पुताई।
लो भाई दीवाली......।
दीपावली का जगमग आलोक,
मिटे क्लेश दु:ख और शोक,
भेदभाव की सिकुड़ी खाई।
लो भाई दीवाली आई.....।

फुलझड़ी


पटाखों की दुकान पर
मुन्ना बोला - मम्मी!
फुलझड़ी मत लेना,
पड़ोस में
बहुत पड़ी है।
कल पापा पड़ोसन आंटी से
प्यार करते हुए
कह रहे थे
तू तो मेरी जान
खुद फुलझड़ी है॥
तब मम्मी बोली -
डोंट वरी, मैंने,
सब हिसाब
बराबर किये हैं।
पटाखों वाले अंकल को
पैसे कहां दिये हैं।